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Thursday, 7 January 2021

होमी जहांगीर भाभा की भविष्यवाणी क्या ब्रिटेन में सच साबित होने जा रही है?

ब्रिटेन ने 2040 तक फ्यूज़न रिएक्टर वाला व्यावसायिक बिजलीघर बनाने का एलान किया है. क्या यह मुमकिन है?न्यूक्लियर फ्यूज़न (संलयन) का विज्ञान 1930 के दशक से ही मालूम है जब प्रयोगशाला में हाइड्रोजन आइसोटोप के परमाणुओं का फ्यूज़न कराया गया था.हम रोज़ाना इसे घटित होते देखते हैं. सूरज एक विशाल आत्मनिर्भर फ्यूज़न रिएक्टर की तरह काम करता है. इसी तरह दूसरे तारे भी.तारों में फ्यूज़न उनके विशाल गुरुत्वाकर्षण बल से संचालित होता है जो परमाणुओं को एक-दूसरे में मिलाकर भारी परमाणु में बदल देता है. इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है.धरती पर फ्यूज़न रिएक्टर बनाकर इस प्रक्रिया को दुहराना जटिल काम है. इसमें इंजीनियरिंग की चुनौतियां सामने आती हैं.कई मायनों में फ्यूज़न की ख़ूबियां कीमिया (रसायन विज्ञान) से मिलती-जुलती हैं. प्राचीन फ़ारस के कीमियागर (रसायनशास्त्री) अपनी ज़िंदगी के कई दशक दूसरे धातुओं से सोना बनाने में खपा देते थे.फ्यूज़न उसी तरह की प्रक्रिया है जिसमें हल्के परमाणुओं के नाभिक एक-दूसरे से जुड़कर भारी नाभिक में बदल जाते हैं और एक अलग रासायनिक तत्व का निर्माण होता है.बिजली बन सकती है, सोना नहीं कीमियागरों को यह बात मालूम थी कि चूंकि सोना उनकी आँखों के सामने मौजूद है, वह किसी न किसी तरीक़े से बनाया गया होगा. उनको इस बात का अहसास नहीं था कि भारी तत्व, जैसे सोना, असल में फ्यूज़न से बने हैं. मरते हुए तारों में विस्फोट से ऐसे धातु अंतरिक्ष में बिखर गए हैं.परमाणुओं के बीच फ्यूज़न शुरू कराने के लिए भारी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसलिए धरती पर हल्के तत्वों का फ्यूज़न ही कामयाब हो सकता है, जिसमें सोना नहीं बन सकता. फ्यूज़न रिएक्टर में हाइड्रोजन आइसोटोप को डेढ़ करोड़ डिग्री सेंटीग्रेट तापमान पर गर्म किया जाता है जो सूरज की गर्मी के बराबर है. इससे प्लाज्मा बनता है जो पदार्थ की चौथी अवस्था है. प्लाज्मा को चुंबकीय ताक़त से दबाया जाता है, जिससे हाइड्रोजन के आइसोटोप जुड़कर हीलियम में बदल जाते हैं और तीव्र गति वाले न्यूट्रॉन बाहर निकलते हैं. इस प्रतिक्रिया से 17.6 मेगा इलेक्ट्रॉन वोल्ट ऊर्जा मुक्त होती है जो सामान्य रासायनिक दहन से मिलने वाली ऊर्जा से एक करोड़ गुणा ज़्यादा है. न्यूक्लियर फ़िशन (विखंडन) में भारी परमाणु टूटकर हल्के परमाणुओं में बदलते हैं. इसके उलट न्यूक्लियर फ्यूज़न में हल्के परमाणु जुड़कर भारी परमाणु में बदलते हैं. इसका मतलब है फ्यूज़न में हानिकारक अपशिष्ट कम निकलते हैं. न्यूट्रॉन की बमबारी से फ्यूज़न प्लांट थोड़ा रेडियोधर्मी हो जाता है लेकिन ये रेडियोधर्मी उत्पाद अल्पकालिक होते हैं. फ्यूज़न से प्रदूषण-रहित, जलवायु-अनुकूल ऊर्जा पैदा की जा सकती है. इसमें रेडियोधर्मी कचरा निकलने का ख़तरा भी नहीं है. sabhar : bbc.com

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